महाकाल की खोज में
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| Mahakal ki khoj |
महाकाल की खोज में
निकली है सूरज की किरण,
महाकाल की खोज में,
पर महाकाल स्वयं विराजे,
महाकाली की गोद में।
कौन नाप सका है उस गहराई को,
कौन जान सका उस अनंत को?
महाकाली की थाह कहाँ,
जहाँ खो जाए स्वयं का अस्तित्व।
बिन मंज़िल की राह कहाँ,
और राह मिले तो अंत कहाँ?
जन्मों-जन्मों की शोध लगे,
फिर भी परम का अंत कहाँ?
किसी के पक्ष में नहीं,
किसी के विरोध में नहीं,
सत्य की तलाश है हमें,
अपने ही भीतर के बोध में कहीं।
खोजना है हमें,
सोचना है हमें—
आखिर यह खोज क्या है?
और क्या खोजना है हमें?
क्या मंदिरों में खोजें उसे,
क्या आकाश में ढूँढ़ें उसे?
क्या शास्त्रों के शब्दों में,
या संसार के हर कण में खोजें उसे?
जिसे पाने की चाह लिए,
हम जीवन भर भटकते हैं,
वही तो हर श्वास में है,
जिससे हम स्वयं धड़कते हैं।
ईश्वर की खोज नहीं,
ईश्वर की आशा नहीं—
ईश्वर तो स्वयं अस्तित्व है,
उससे अलग कोई भाषा नहीं।
वह पत्थर में,
वह प्राणी में,
वह तुममें और मुझमें है।
वह प्रकाश की हर किरण में,
वह अंधकार की गहराई में है।
बस दृष्टि बदलनी है,
बस इतना-सा बोध होना है—
जिसे खोज रहे हैं बाहर,
उसे अपने भीतर पाना है।
न महाकाल दूर कहीं,
न महाकाली दूर खड़ी,
शक्ति और शिव का यह मिलन,
हर जीव की धड़कन में पड़ी।
अनंत जन्म भी कम पड़ जाएँ,
यदि खोज बाहर करते जाएँ;
एक क्षण का बोध ही काफी,
यदि भीतर उतरते जाएँ।
खोज खत्म नहीं होती,
खोज का अर्थ बदल जाता है—
जब खोजने वाला ही समझ जाए,
कि जिसे खोज रहा था,
वह स्वयं उसी में समाया है।
बस आ जाए इतनी बोध में,
बस आ जाए इतनी बोध में।

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