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महाकाल की खोज में

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  Mahakal ki khoj महाकाल की खोज में निकली है सूरज की किरण, महाकाल की खोज में, पर महाकाल स्वयं विराजे, महाकाली की गोद में। कौन नाप सका है उस गहराई को, कौन जान सका उस अनंत को? महाकाली की थाह कहाँ, जहाँ खो जाए स्वयं का अस्तित्व। बिन मंज़िल की राह कहाँ, और राह मिले तो अंत कहाँ? जन्मों-जन्मों की शोध लगे, फिर भी परम का अंत कहाँ? किसी के पक्ष में नहीं, किसी के विरोध में नहीं, सत्य की तलाश है हमें, अपने ही भीतर के बोध में कहीं। खोजना है हमें, सोचना है हमें— आखिर यह खोज क्या है? और क्या खोजना है हमें? क्या मंदिरों में खोजें उसे, क्या आकाश में ढूँढ़ें उसे? क्या शास्त्रों के शब्दों में, या संसार के हर कण में खोजें उसे? जिसे पाने की चाह लिए, हम जीवन भर भटकते हैं, वही तो हर श्वास में है, जिससे हम स्वयं धड़कते हैं। ईश्वर की खोज नहीं, ईश्वर की आशा नहीं— ईश्वर तो स्वयं अस्तित्व है, उससे अलग कोई भाषा नहीं। वह पत्थर में, वह प्राणी में, वह तुममें और मुझमें है। वह प्रकाश की हर किरण में, वह अंधकार की गहराई में है। बस दृष्टि बदलनी है, बस इतना-सा बोध होना है— जिसे ...