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स्वर शिव

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 आओ हम स्वर बन जाए,  कोई राग रंग रचाए,  यहाँ सब कुछ है, लय की एक धारा,  स्वर से चलता, है जग सारा,  एक समय मे ,हम एक ही सास लेते,  या अंदर आते, या बाहर जाते,  यही तो लय है, यही है  संगीत,  बहे जाओ स्वर मे,स्वर का बनके मीत,  जो हमेशा मेरे सांसो से आता जाता,  वही मुरली वाला वही है विधाता,  नापो,कभी अपने सांसों की, गहराई,  पा लोगे अपनी प्रभुताई,  जिसे हमन खोजा, सदा दर के बाहर,  वह आराम से  बसा हुआ मेरे अंदर,  या यह कहें की वही देखते है,  यह भ्रम है हमारा की हम देखते हैं,  अंतरात्मा की परछाई मिटाना पड़ेगा,  फिर शिव मे एक हो जाना पड़ेगा,  शिव,नाम ही है एक होने का,  ज्योति स्वरूप दो कोने का,  वही दो हैं सांसें, एक आती एक जाती,  कहीं भी रखो स्थिर अपनी छाती, ब्रम्हांड की नाद मे, होकर सवार,  खोलो अपनी स्वर के द्वार,  स्वर को मिलाना, मानो शिव हो जाना,  धुन मधुर बंशी की बन जाना,  आओ हम स्वर बन जाएं,  कोई राग रंग रचाए।