प्रकृति के नियम

 Law of nature 


हमे धरती पर जिवित रहने के लिए प्रकृति के नियम को जानना बहुत जरूरी है, प्रकृति किसी के लिए भी अपने नियम नहीं बदलता, कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि आप क्या सोचते हैं और आप क्या करते हैं, कोई इंसान हो या कोई जानवर हो जीव हो या निर्जीव हो ईश्वर ने सबके लिए नियम बना रखे हैं सबको उनके बनाए गए नियम के अनुसार ही चलना होता है, जिसने भी उस परम नियम के विरुद्ध चलने का प्रयास किया उसका मिटना तय है,

     जब तेज आँधी आती है तब सारे पौधे हवा की बहाव की दिशा में झुक जाते हैं, हालाँकि यह हवा के दबाव के कारण होता है परंतु यदि कोई पेड़ ना झुक पाए उसकी शाखाओं मे लचीला रुख नहीं अपनाया तो क्या होगा? निश्चित रूप से उस पेड़ की शाखाएँ टूट कर जमीन पर गिर जाएंगी।


      धरती पर कई प्राकृतिक विराट महाशक्तियों के सामने मनुष्य की कोई औकात नहीं है, हम एक पल भी उसके सामने नहीं टिक पाएंगे। इसलिये हमे यह जान लेना चाहिए कि हमसे भी शक्तिशाली और भी कोई है, हम तो एक तिनके के समान हवा मे उड़ सकते हैं,

     जल जिस तरह जीवन के लिए वरदान है ठीक उसी तरह जानलेवा भी है, आप कल्पना कीजिए कि समुन्दर के अथाह गहराई मे मनुष्य की क्या  औकात है, आज तक मानव समुद्र मे पाए जाने वाले जीवन के बारे में भी पूरी जानकारी नहीं जुटा पाया ना ही धरती पर कितना जल है इसका अंदाजा लगा पाया है और ना उसकी अथाह गहराई को नाप पाया है,।

   जब प्रचंड आग जंगलों मे लग जाती है तो उस पर काबु पाना असंभव हो जाता है, मै यह इसलिए बोल रहा हूं कि हमारी कोई हैसियत नहीं है कि हम nature से लड़ाई लड़ सकते हैं, अगर हम उसके विरूद्ध जाने की कोशिश भी करते हैं तो हमे उसकी कीमत हर हाल मे चुकाना पड़ेगा।


वातावरण का संतुलन 

    शहरों के आसपास या गावों के समीप के जंगल ताबड़तोड़ कटाई के बाद क्या हुआ, सबसे पहले इमारती लकड़ी बहुतायत काटे जाने लगे, सारी इमारती पेड़ काट दिए गए, अब उन पेड़ों की बारी आ गई जो जलाने के काम आती थी, अब वह भी साफ कर दिया गया, उन खाली स्थान को भरने की जिम्मेदारी ना सरकारी विभाग ले रहे हैं ना नागरिकों मे प्रकृति को संतुलित होने के लिए कोई कदम उठाया।

       हर शहरों से निकलने वाली गंदगी, दूषित जल, कारखानों का अवशिष्ट, ज़हरीला होता वायु, स्वर्ग जैसी धरती जैसे प्लास्टिक लोक बन कर रह गई है, प्राकृतिक आपदाओं की ज़न- धन की हानि होती है यह किसकी देन है, आप कहेंगे ईश्वर की जिसने आपको रहने के लिए जमीन दी, शुद्ध हवा- पानी दिया उसने ही ऐसा किया तो आप गलत हैं, यह हमने किया, हम सबने किया, हम सबने मिलकर एक साथ किया इसमे हम सबकी भूमिका निभाई है। 

          परंतु प्रकृति हमेशा सुधार की प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभाने मे सक्षम है, जब हरियाली मानवों द्वारा साफ कर दिया गया तब नेचर कई तरह के छोटे पौधे और झाड़ियां उगने लगती हैं। और ज्यादातर झाड़ियों मे कांटे होते हैं और पशुओं के खाने योग्य नहीं होती हैं, इसलिए वातावरण में संतुलन बना रहता है। 

       पुटूस नाम का एक पौधा होता है, जिसकी पत्तियाँ खुरदुरी, गंध युक्त और कंटीले होते हैं, यह पौधा बहुत तेजी से फैल जाती है और बंजर भूमि मे भी उग जाती है, खाली स्थानों को घेर लेती है,यह प्रकृति का  स्वतः होने वाली प्रक्रिया है।

    

जो भी हम देंगे वही पाएंगे 

         "आज हमारे पास जो भी उपलब्ध है वह हमारे भूतकाल में किए गए कार्यों का नतीज़ा है, आप आज क्या कर रहे हैं वह कल आपके सामने अवश्य आएगा, "

       यह कथानक मेरी नहीं है और ना ही किसी विद्वान का, यह एक परम सत्य है, जो हर जगह लागू होती है, जैसा हम चाहते हैं हमे उस दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है, धरती हमारे-आपके घर जैसा है हमे अपनी भूमि और उसकी रखरखाव करने की जरूरत है, हमें उन होने वाले बदलाव को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए जो चुपचाप धरती के किसी हिस्से मे हो रहा है, हम अपने तक सीमित रह गए हैं, हमे अपने अलावा किसी की भी फिक्र नहीं है, पर कहीं ना कहीं, अपने फायदे के लिए हम एक बड़ी समस्या को बुलावा देते रहे हैं और उसका परिणाम भुगतना भी पड़ा है। 



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