Unusual state of Kundalini meditation
कुण्डलिनी ध्यान की अपूर्व स्थिति
Unusual state of Kundalini meditation
जब हम ध्यान की मुद्रा में सीधे बैठ जाते हैं ,तब हमारी रीढ़ सीधी और संतुलित हो जाती है।पूरे शरीर का भार संतुलित हो जाता है ठीक उसी तरह जैसे कि एक पेड़ जंगल के शांत वातावरण में अपने आपको सीधा खड़ा रख पाता है, यहां तक कि वह पेड़ इतना संतुलित होता है कि बिना जड़ों की सहायता लिए बिना भी वह सीधा टिकाए रखने में कोई परेशानी नहीं है। जब तक कि उसे बाहरी बल द्वारा उसकी संतुलन को बिगाड़ा ना जाए।
जब हम उस पेड़ की तरह अपने रीढ़ को सीधा और संतुलित करने में सफल हो जाते हैं, तब हमारे शरीर का भार हमें शून्य प्रतीत होने लगता है, और हमारी सरिरिक ऊर्जा जो कोशिकाओं में बिखरी हुई थी वह सिमट कर हमारे चक्रों पर एकत्रित होने लगते हैं, इस तरह हमारे कुंडली जागरण का मार्ग प्रशस्त होने लगता है, अब आप अपनी कुण्डलिनी ऊर्जा को महसूस कर, उसकी संरचना को समझ कर उसे जागृत कर सकते हैं। ऐसा शास्त्रों की भाषा में कहा गया है किन्तु मै इस क्रिया को कुंडली जागरण नहीं समझता, या यह कुंडली जागरण के लिए उचित सब्द नहीं लगता, हमें यह जानना जरूरी होगा कि पहले से कुंडली जगी हुई है, उसे जगाने की जरूरत नहीं है, अगर जगी हुई नहीं हो तो फिर जीव में प्राण का संचालन कैसे होता, अगर कुनलिनी सोई होती तो संभवतः जीव निष्प्राण होता, अगर आपके पास उचित तर्क हैं तो आप बिल्कुल हमारी धारणा को नकार सकते हैं, हमारे शरीर में निहित चक्र ब्रमहांडिय ऊर्जा की अदृश्य निहित ऊर्जा है, जो हर जीव को इस पृथ्वी पर एक स्वतंत्र जीव के रूप में चलाती है, और जीव के रूप में विचरण करती है।
दरअसल धरती पर ब्रह्माण्ड की ऊर्जा कड़-कड़ में विद्यमान है, या निहित है, या बिखरी हुई है, कोई आत्मा किसी शरीर में नही जाती अपितू, जहां आत्मा होती है वहीं शरीर या काया बनती है,
काया शब्द का इस्तेमाल मै यहां इसलिए कर रहा हूं कि काया किसी भी रूप में हो सकती है चाहे कोई मनुष्य की हो या किसी जंतु या किसी आंखों से ना दिखाई देने वाले जीव की, मै यह कहना चाहता हूं की आत्मा को शरीर ग्रहण करती है और आत्मा को शरीर ही मृत्यु के पश्चात छोड़ती है। आत्मा मुक्त हो जाती है , स्वतंत्र हो जाती है, परन्तु एक बात स्पष्ट है कि आत्मा बिना शरीर या काया के नहीं रहना चाहती, सदैव आत्मा एक आकार चाहती है हर वक्त एक आत्मा किसी पिंड को पैदा करने के लिए तत्पर होती है, और एक निश्चित आधार बनाना चाहती है,जिससे उसे आधार मिल सके, आपने कभी यह सुना होगा कि किसी के अंदर कोई आत्मा प्रवेश कर जाती है और उस व्यक्ति को सताती है, कोई आत्मा किसी के अंदर जिसमें पहले से आत्मा निहित है, अंदर जाने का कोई स्थान खाली नहीं है जिस माध्यम से आत्मा प्रवेश कर सके अपितु होता यह है कि शरीर के अंदर स्थित ब्रमहंडिय ऊर्जा जिससे इंसान जीवित रहता है, उसका रूपांतरण होने लगता है , वह ऊर्जा ठोस आधार से विघटित होकर, अपनी संतुलन किसी अन्य प्रकार कि ऊर्जा में रूपांतरित करने लगता है जिससे जीव की प्रतिक्रयाएं बदल जाती है, और हमे लगता है कि कोई और आत्मा उसके शरीर में प्रवेश कर गई है, चूंकि जो प्रकृति उस व्यक्ति की पहले थी उससे भिन्न प्रकृति दिखाई देने लगता है, जिससे जीव की मानसिक संतुलन में बहुत अंतर आने लगता है, उसकी प्रकृति जैसे संतुलन में आती है आदमी पहले जैसा हो जाता है और पहले उसने क्या किया उसका ख्याल उस व्यक्ति को नहीं रहता, क्योंकि उसके मस्तिष्क की कड़ी उस परिवर्तन को अंगीकार नहीं करती, लेकिन देखने वाले को उसकी भिन्न प्राकृति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
कोई रस्सी तब तक अपनी वर्चस्व नहीं खोती जब तक उसका एक एक रेशा टूट कर बिखर नहीं जाता, आत्मा ही जीवन का आधार होती है, जब तक शरीर में रक्त बह रही है सांसे चल रही है तब तक ना शरीर आत्मा को छोड़ती है ना आत्मा शरीर को।
एक जादू या एक योग शक्ति क्या है जिसमें साधक अपने शरीर को किसी जीव में बदल देता है, दरअसल वह किसी चिड़िया में वह नहीं घुसता अपितु वह अपने योग से एक काया का निर्माण करता है, और उसमें अपनी ऊर्जा को स्थानांतरित करता है, और सबको अचंभे में डाल देता है, और आपको लगता है कि वह चिड़िया का रूप ले लेता है।
जब रीढ़ सीधी हो और संतुलित हो जाती है तब आपकी चित स्थिर होने लगती है, चित स्थिर इस लिए होने लगती है क्योंकि अब चित को शरीर की कोई चिंता नहीं रह गई है, वह शरीर को भूल गया है क्योंकि अब उसे शरीर को संभालने और अन्य क्रिया कराने के लिए उसकी आवश्यकता नहीं रह गई है, शरीर किसी शांत पेड़ की भांति अपने रीढ़ पर सवतः टिका हुआ है, आत्मा जब शरीर के अंगों में थी तब उसे धरती के गुरुत्व का अहसास था परंतु अब जब एक सिध में आ गई तब वह गुरुत्व की सीमा के पार चली गई है, एकदम से हल्की हो गई है, ऐसा लगेगा जैसे वह हर जगह किसी भी छड़ पहुंच सकती है, ऐसा भी लगेगा जैसे वह हर जगह फैल गई है, सबकुछ उसकी पहुंच में आ गया है और सबमें होने का अहसास किया जा सकता है। आपको परम आनंद की अनुभति होने लगती है और आपको लगने लगता है कि आप परमात्मा की गोद में आ गए हैं, तृप्त हो गए हैं, अब आपको किसी की चाह नहीं रह गई है।
मैंने ऊपर जिक्र किया था कि कुण्डलिनी कभी जागृत नहीं होती, यह एक मह्वपूर्ण विषय है,
कुण्डलिनी आपके अंदर नहीं है ऐसा नहीं है, आपको जगाना पड़े ऐसा भी नहीं है, ऊर्जा जागृत नहीं होती बल्कि निहित होती है। आपके अंदर आपकी ग्रंथि में जिन्हें हम चक्र कहते हैं , ब्रम्हांड की सम्पूर्ण ऊर्जा शक्ति मौजूद है, परन्तु आपके मानसिक और शारीरिक क्षमता के अनुसार ही उसकी उपयोगिता है आपको इसका उपयोग करना पड़े ऐसा भी नहीं है, बल्कि स्वतः आप का शरीर आपकी आत्मा इसमें डूबी रहती है। कहने का तात्पर्य यह है की, आपकी जितनी जरूरत है आपको मिल जाती है,
सारा जंगल हरियाली से भरी हुई है, जो सारे सारे संसार के जीवों का पेट भर सकती हैं परन्तु एक हिरण उतनी ही पत्तियां खाता है जितनी जरूरत होती है , बाकी जंगल का उपयोग छिपने के लिए करता है, उसी तरह इंसान की भी जरूरतें होती हैं, जो अपने आप पूरी होती रहती हैं, आपकी कुण्डलिनी ऊर्जा उतनी ही सक्रिय होती है जितना इंसान की कैपिसिटी होती है, हमारे दिमाग की कैपिसिटी होती है।
जब साधक अपने मस्तिष्क और अपने शरीर को परिपक्व कर लेता है तो कुण्डलिनी की निहित ऊर्जा परत दर परत खोलता है और ब्रम्हांड के अस्तित्व का दर्शन कर पाता है ऐसा भी नहीं है कि योगी या साधक अचानक से कुण्डलिनी को जागृत कर देता है, वह ऐसा कर भी नहीं पाएगा, अगर एक साथ चार परतें भी योगी खोल गया तो वह पागल भी हो सकता है, उसके शरीर में विकृति भी आ सकती है, अगर उसका दिमाग और उसका शरीर अभी तैयार नहीं हुआ है।
कुंडली में प्रवेश करने की प्रक्रिया ही पागलपन से भरी हुई है, या कहें आत्म हत्या करने जैसी है, इसीलिए जो पहुंचे हुए साधु हैं वह सलाह देते है कि बिना उपुक्त देखभाल के बिना गुरु के कुंडली में प्रवेश नहीं करना चाहिए।
कभी कभी साधक को भ्रम भी हो सकता है साधक को इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि ख्वाब और सत्य में अंतर होता है, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि को सास्वत है वह भी दिखाई देगा और जो आभासी है वह भी दिखाई देगा, जो शास्वत है वह नाम से ही पता चलता है कि वह कोई परम सत्य है तथा सदा से निहित है, और उसके ठोस पथ निर्मित है। और आभासी का मतलब है जो है ही नही परन्तु होने का आभास दिलाता है। अचरज की बात यह है कि जैसा वास्तविक होता है वैसा ही आभासी भी होता है, उनमें कोई अंतर दिखाई नहीं देता, परन्तु सत्य की ओर चलने वाले साधक उनमें फर्क करना जानते हैं, और जो अभी इस योग कुशलता मै कच्चे है जल्दी ही भटक जाते हैं।
इसका एक तकनीक है, आप कोई छोटे स्टेप ले सकते हैं और उसमे कुछ दूर चलने के पश्चात रुक जाएं और निश्चित करने के लिए खोज करें कि आप सही दिशा में निकले हैं, ज्यादा दूर जाने के बाद आप रास्ता भूल सकते हैं, जहां से आपको भरोसा है कि आप वापस आ सकते हैं वहीं पर रुक जाएं और एक एक करके सारे तर्कों को सामने लाते जाएं, जो मजबूत आधार के हो उन्हें एक तरफ और जिनके तथ्य मजबूत ना हो उन्हें एक तरफ रख कर देखें , अब को सत्य मार्ग है उसका मार्ग प्रशस्त दिखाई देगा अब आप आगे बढ़ सकते हैं, और जब भी आपको कोई चौराहा या दोराहा नजर आए वहीं रुक जाएं और देखें कि सही और सासवत रास्ता कौन सा है , आप जिसे छूते चले जाएंगे वह आपके अंतर्मन में बसती चली जाएगी, आप उसके अधिकारी होते चले जाएंगे।
हमें उधर बढ़ना चाहिए जिधर संभावनाएं हों हमे उधर कभी भी नहीं जानी चाहिए जहां रास्ता एक नया सवाल बनकर खत्म हो जाए। आपको तर्क की कसौटी पर परख कर ही आगे बढ़ना चाहिए।
काली अमावस की रात हो और हाथ में अपने मन का दिया लिए हुए किसी बियाबान जंगल से आप गुजर रहे हों और आप रास्ता भटक जाएं, जंगल के मार्गों में कई उपमार्ग बन जाते हैं जो जंगली जानवरों के द्वारा बनाए गए होते हैं अगर आप कभी घने जंगलों में गए होंगे तो यह बात आपको निश्चित ही ज्ञात होनी चाहिए, यह उपमर्ग कहीं लेकर नहीं जाते , इनका कोई मंजिल नहीं होता बल्कि ये रास्ते कहीं और घने जगलों में जाकर गुम हो जाते हैं, जब आप इन मार्गों को मुख्य मार्ग समझ लेते हैं और आत्मवश्वास के साथ इन रास्तों में बढ़ते चले जाते हैं और वह रास्ता और भी घनेरे जंगल में जाकर खत्म हो जाए तो आपको कैसा लगेगा, अब आपकी मनोस्थिति ऐसी है कि आपने जहां से रास्ता बदला था वह भी रास्ता सही था या नहीं इसपर भी संदेह उत्पन्न होने लगता है, और आप और भी भुलभुलैया में फंसते जाते हैं, और अब आपके पास जीवित बचने और बाहर निकल जाने की सारी संभावनाएं धराशाई होने लगती हैं,
ठीक इसी तरह आभासी रास्ते भी होते हैं जहां योगी या साधक भटक सकता है, फिर उसे उल्टे कदमों से चलकर उसी रास्ते को खोजना पड़ता है, जहां उसने रास्ता बदला था संदेह यहां यह पैदा होता है कि , कौन सा रास्ता सही था और कौन सा गलत। अब किसी भी रास्ते पर उस साधक को भरोसा नहीं रह गया। आपको घुटन भी हो सकता है जीवन का भय सताने लगता है, आप ऐसे जगह जाकर खड़े हो सकते हैं, जहां से आवाज लगाने पर कोई सुन भी नहीं पाएगा।
इसीलिए आपको गुरु के मार्गदर्शन में यह क्रिया करनी चाहिए, अन्यथा ऐसा भी हो सकता है कि आप खुद में ही कहीं गुम हो जाएं, इसलिए कुण्डलिनी की अनंत ऊर्जा को इस तरह दिखाया गया है कि एक सर्प अपनी ही पूछ को अपने मुंह में ले रखा है, कुण्डलिनी ब्रम्हांड का रूप है जैसे ब्रम्हांड का कोई आदि है ना अंत है ऐसे ही इस चक्रों का ना आदि है ना अंत है, यह चक्र सीधे तौर पर ब्रम्हांड से जोड़ देते हैं, आप किसी अथाथाह समुद्र में गुम हो सकते हैं। जब आप इस दिशा में जाते हैं तो आप जाकर भी कहीं नहीं जाते, पाकर भी कुछ नहीं पाते, आप कुछ होकर भी कुछ नहीं होते अगर आपको कुण्डलिनी में उतरने का ठोस आधार नहीं होता आपको पता होना चाहिए कि आप किस चीज की खोज में कुंडली के पन्नों को खोलना चाहते हैं।
एक बात हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि जिस मुद्रा में आपने कुण्डलिनी में प्रवेश किया था, आंखे खुलने के बाद आप उसी मुद्रा में उसी स्थिती में जब खुद को पाने कि कोशिश करे संभवतः आप भटक नही पाएंगे, भटकाव की स्थति में हुए अनुभवों को भूल जाएं।
ध्यान एक ऐसी मदिरा का सागर है जो अपने ही नशे में चूर है।
धन्यवाद




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