पुनरावृत्ति का सिद्धांत Theory of Recurrence
पुनरावृत्ति का सिद्धांत Theory of Recurrence
दोस्तों क्या आप जानते हैं कि ब्रह्मांड के हर पिंड पुनरावृति कर रहे हैं, तब आप यह भी मान सकते हैं कि पुनरावृति में जो उस माध्यम से जो ऊर्जा प्रगट हुई है, वह या तो पूर्व से अंत तक एक समान होगी या पूर्व से मध्य या अंत तक यह ऊर्जा कई बार स्पंदित हुई होगी।
लेकिन इससे पहले हम यह जानने की कोशिश करते हैं, कि हमारे दैनिक जीवन में कौन-कौन सी चीजें हैं जो पुनरावृति कर रही हैं, और कौन-कौन सी चीजें स्थिर हैं, या जिनकी चाल एक सीधी रेखा पर है।
पुनरावृति का यह अर्थ लगाया जाता है कि, जब कोई ऑब्जेक्ट प्रारंभिक स्थान से चलकर पुनः एक निश्चित समय में उसी बिंदु से आकर मिलता है, अर्थात उस ऑब्जेक्ट की एक पुनरावृति कहलाती है।
धड़कन की एक छोटी पुनरावृति, श्वसन की एक पुनरावृति, घड़ी की एक पुनरावृति, धरती की एक पुनरावृति, चांद की एक पुनरावृति, ध्वनि की एक पुनरावृति, प्रकाश की पुनरावृति आदि, अब हम यह मान सकते हैं कि, हर ग्रह नक्षत्र जो हमें आकाश में दिखाई देते हैं, सभी अपनी पुनरावृति गति में गतिमान है।
हमारे धरती पर मौसम की पुनरावृति क्यों होती है, स्पष्ट है कि हमारे धरती पर जो मौसम की पुनरावृति होती है, वह सूर्य से आने वाली ऊर्जा से होती है, और यह इसलिए भी होती है, कि पृथ्वी एक नियत समय में अपने अक्ष की पुनरावृति करने के साथ सूर्य के अक्ष की पुनरावृति करती है अर्थात, अगर धरती स्थिर रहती तो मौसम भी स्थिर हो जाते, मौसम स्थिर हो जाते तो, दिन रात भी नहीं हो पाते अर्थार्त समय स्थिर हो जाता, हम यह मान सकते हैं कि समय पिंड के घूमने से निर्मित होता है।
सोचने वाली बात यह है कि ब्रह्मांड में हर एक पिंड अपने अक्ष पर और किसी ना किसी बड़े पिंड की गति करता है, तो उस पिंड की समय का निर्माण होता है, धरती पर रोज सूर्य का निकलना तथा अस्त होना या कह सकते हैं कि नियमित रूप से पुनरावृति करना समय का निर्धारण करना होता है, चंद्रमा के नियत समय में अपने कलाओं का, जिसका कारण सूर्य ही है, वह भी समय का निर्धारण करता है।
तो हम यहां भी मान सकते हैं कि, हर पिंड पर समय अलग अलग होगा, जैसे धरती का 365 दिन 1 वर्ष होता है अर्थात 365 दिन में धरती सूरज का एक चक्कर पूरा कर करती है,अर्थात एक पुनरावृति करती है, मंगल ग्रह का यह समय अलग है, बृहस्पति ग्रह का अलग है, सभी ग्रहों का अलग-अलग है।
ज्योतिष में इसी गणना के आधार पर भविष्य कथन किया जाता है, कुछ लोग इसे मानने से इनकार करते हैं पर कुछ लोग इसके पक्ष में है, आपको क्या लगता है कि ग्रह नक्षत्र आपके जीवन पर प्रभाव डालती हैं? संभवत डालती हैं।
इस ब्रम्हांड में जो भी हो रहा है या जो होना है वह प्रकृति के लिए कोई नई बात नहीं है, पुनरावृति का सिद्धांत या कहता है कि इस ब्रह्मांड में जो कुछ हो रहा है पहले हो चुका है, उसकी पुनरावृति हो रही है और पुनः वैसा ही होगा, जो इस सिद्धांत को समझ लेगा उसे बहुत सारे सवालों का जवाब मिल जाएंगे।
मैं यहां बताने की कोशिश करना चाहता हूं कि कैसे ब्रह्मांड की ऊर्जा हर जीव के जीवन को नियंत्रित करती है, उसे चलाती है। अब सवाल यहां यह निकल कर आता है ज्योतिष हमें यह बताती है कि, आपके भविष्य में क्या होने वाला है या क्या हो रहा है। मेरे हिसाब से 5 % से अधिक नहीं है, सटीक है पर अधिक नहीं है क्योंकि, ज्योतिष विद जो गणना करते हैं, वह 9 ग्रहों एवं 27 नक्षत्रों और इसी आधार पर करते हैं, संभव है, सही है। पर हमारे ब्रह्मांड में और भी बहुत कुछ है, जिसके बारे में हमें जानना और समझना बाकी है।
तो जैसे हर पिंड गति कर रही है, स्थिर है, तो हर पिंड की ऊर्जा एवं प्रभाव हर जीव के जीवन पर उसका असर दिखाई देगा, उसे समझने के लिए सूर्य और चांद से आने वाली ऊर्जा से बेहतर और हमारे पास कुछ भी नहीं है। मूल रूप से हमारे जीवन का 95% प्रभाव इन्हीं दो ग्रहों का होता है, बाकी अन्य ग्रहों नक्षत्रों का प्रभाव सूक्ष्म रूप से हमारे जीवन पर पड़ता है।
सूर्य हमारे जीवन ऊर्जा का तथा चंद्र को हमारे मस्तिष्क ऊर्जा का स्रोत या द्योतक माना जा सकता है।
यह समझना बहुत आसान है। सूर्य ही धरती पर ऊर्जा का स्रोत है, सूर्य के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है। पेड़ पौधे जिनमें जीवन है, वह सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा से ही है। पर उनमें सोचने समझने की क्षमता नहीं है, जिन जिवित प्राणियों में सोचने समझने की क्षमता विकसित हुई है, वह संभवत चंद्र की प्रभाव से उत्पन्न हुई है। आपको पता होगा कि चंद्रमा के कारण ही समुद्र में हलचल होता है। जैसे धरती पर 70% हिस्सा पानी का है, वैसा ही हमारे शरीर में भी 70% हिस्सा पानी ही है। अतः हम यह कह सकते हैं कि, पानी हमारे जीवन का 70% क्रिया का कारण है। पानी आपके शरीर में हो या समुद्र में जहां भी होगा अपना काम करेगा। अब सवाल यह उठता है कि पेड़ पौधे में भी पानी होता है पर वह स्थिर जीव हैं, उनमें मस्तिष्क नहीं होता जिसे वे इतना सेन्स्टिव नहीं होते जीवो की तरह।
हालांकि वो स्थिर होकर भी अपना काम वैसा ही कर रहे होते हैं जैसा हम करते हैं।
अब मैं एक सवाल यहां रखना चाहता हूं कि, क्या इंसान को ईश्वर ने बनाया है? या यह जीवन की स्वता प्रक्रिया है, तो इसका जवाब मेरे पास भी नहीं है, जहां हमारे ज्ञान विज्ञान की सीमा खत्म होती है, वहीं से ईश्वर की सीमा प्रारंभ होती है। हमारी उम्र 100000 वर्ष भी हो जाए विज्ञान कितना भी तरक्की कर ले, इंसान कितना भी ज्ञानवान हो जाए, वह ईश्वरीय सीमा को छू भी नहीं सकता, जितना अपने ज्ञान को बड़ा कर पाएगा इंसान वहां तक इंसान का साम्राज्य होगा, वहां का खुद का राजा समझेगा पर वह हकीकत में ईश्वर की महासत्ता से अछूता ही रहेगा।
इंसान का ज्ञान विज्ञान चलता रहेगा, वही धरती का अंत बनेगा, फिर इंसान जन्म लेगा और तार्किक दिमाग का इस्तेमाल कर फिर से एक सत्ता बनाना चाहेगा, वह अपनी सोच एवं आविष्कार से एक महान काम करेगा, फिर वह अंत की महाविनाश में डूब जाएगा।
इंसान लोहे के कीमती सामान बना ले या सोने के कीमती समान बना ले, उसका उपयोग कर ले, उससे नाम कमा लें, लेकिन जो उसे फिर से जब उसी भट्ठी में डाल दे, तो वह सामान का नामोनिशान मिट जाता है। वैसा ही प्रकृति है।
" महाविनाश काल में ईश्वर फिर से अपनी बनाई माया को मिला देते हैं, और फिर से एक नया संसार का जन्म होता है, और फिर यही पुनरावृति होते रहती है। सही मानने मायने में यही पुनरावृत्ति का सिद्धांत है।"
पुनरावृति का दार्शनिक संदेश
1. पुनरावृति स्थिरता और संतुलन देती है।
2. यह जीवन और ब्रह्मांड की अनंत लय है।
3. साधना और सफलता का आधार पुनरावृति ही है।
4. ब्रह्मांडीय सामंजस्य इसी सिद्धांत पर टिका है।
कलम को रुकना तो मंजूर नहीं है पर हम अपनी कलम को यहां विराम देते हैं, ऐसा ही कोई विषय लेकर आपके समक्ष फिर प्रस्तुत होऊंगा तब तक के लिए मैं आपसे विदा लेता हूं, और मैं उम्मीद करता हूं यह लेख आपको जरूर पसंद आया होगा, और आपके मस्तिष्क में कोई सवाल हो तो कमेंट में जरूर उस सवाल को रखिएगा ताकि मुझे उससे कुछ कोई नजरिया प्राप्त हो सके।
धन्यवाद
Prakash Patel



7697505866
जवाब देंहटाएं